मैं कुआं हूं। वही कुआं, जिसकी उम्र पूछोगे तो शायद गांव के सबसे बूढ़े आदमी के चेहरे की झुर्रियां भी उसका हिसाब न दे पाएंगी। मेरी उम्र उन हाथों से पूछो, जिनकी हथेलियों में कभी मेरे लिए मिट्टी की महक बसी थी; उन आंखों से पूछो, जिन्होंने मेरे भीतर पहली बार पानी की चमक देखी थी; उन बूढ़ी आवाजों से पूछो, जिन्होंने मेरे जन्म की कथा अपने बच्चों को सुनाई और फिर वही कथा अपने पोतों तक पहुंचाई। मगर अफसोस, वे आवाजें अब इस दुनिया में नहीं हैं। जिन लोगों ने मुझे अपने हाथों से आकार दिया था, वे स्वयं मिट्टी की गोद में सो चुके हैं और आज मैं, उनकी बनाई हुई यह पुरानी निशानी, उन्हीं के बिना अपनी आखिरी घड़ी देख रहा हूं। जिला मुख्यालय से ग्वालियर हाईवे की ओर निकलते हुए करीब चौदह किलोमीटर बाद भाहई गांव पड़ता है। इसी गांव के ब्राह्मण मोहल्ले में एक बूढ़ा कुआं खड़ा है। जो आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है।

मेरा जन्म उस समय हुआ था, जब देश की आजादी का सूरज अभी क्षितिज के उस पार था। गांव की गलियां कच्ची थीं, बैलगाड़ियों के पहिए मिट्टी में अपनी लकीरें खींचते हुए निकलते थे, खेतों की मेड़ों पर घास उगती थी और संध्या के समय जब चरवाहे अपने पशुओं को लेकर लौटते थे तो उनके पीछे उड़ती धूल में डूबता हुआ सूरज ऐसा लगता था, मानो दिन भी थककर घर लौट रहा हो। मेरे बनने की खबर गांव में किसी उत्सव से कम न थी। मेरी खुदाई पूरी हुई, धरती की कोख से जल निकला और लोगों की आंखों में जैसे एक साथ उजाला उतर आया। उस दिन गुड़ बांटा गया था। उस समय गुड़ मिठाई ही नहीं, खुशी बांटने का एक बहाना था। लोगों ने एक-दूसरे का मुंह मीठा किया था। किसे पता था कि उसी दिन जन्मा यह कुआं एक दिन केवल गांव की प्यास नहीं, उसकी स्मृतियों का भार भी अपने भीतर उठाएगा।
मैं तब जवान था। मेरी ईंटों पर समय की काई नहीं जमी थी, मेरी जगत पर धूल की कोई मोटी परत नहीं थी और मेरे जल में आसमान इतनी साफ तस्वीर की तरह उतरता था कि लगता था ऊपर का आकाश और नीचे का जल एक-दूसरे से कोई पुराना रिश्ता निभा रहे हैं। फिर एक सुबह मेरी जिंदगी में पनिहारिनों के कदम पड़े और उसके बाद तो जैसे मेरी नीरवता को बोलना आ गया। भोर का तारा अभी बुझा भी न होता, मुर्गे की बांग गांव के किसी कोने से सुनाई पड़ती और कच्ची पगडंडियों पर पायल की रुनझुन के साथ घड़ों की खनक मेरे पास चली आती। सिर पर घड़े, हाथ में रस्सी और बाल्टी लिए वे आतीं और मेरी जगत पर बैठते ही गांव की सुबह मेरे चारों ओर उतर आती।
रस्सियां मेरे भीतर उतरतीं तो मेरे शांत जल में गोल-गोल लहरियां उठतीं। बाल्टी भरकर ऊपर आती तो पानी की बूंदें जगत पर बिखर जातीं। घड़ों में जल पड़ता तो खनक होती, चूड़ियां बजतीं और बातों का सिलसिला शुरू हो जाता। किसी की बहू मायके गई है, किसी की बेटी की सगाई हुई है, किसी के घर बच्चा हुआ है, किसके खेत में फसल कैसी है—गांव की कितनी ही खबरें मेरी जगत पर जन्म लेतीं और वहीं से पूरे गांव में चली जातीं। उस समय मुझे लगता था कि मैं केवल पानी का कुआं नहीं, गांव का वह बूढ़ा चौकीदार हूं, जिसे हर घर की खबर मालूम है, मगर जो किसी की बात किसी दूसरे के सामने नहीं कहता।
कभी उन पनिहारिनों की बातों में हंसी होती, कभी ठिठोली, कभी घर-गृहस्थी की चिंता और कभी लोककथाओं का संसार। कवियों की पंक्तियां दोहराई जातीं। रहीमदास जी का दोहा सुनकर हंसी की फुहार छूटती खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चलाय। आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय।” वह हंसी आज भी मेरी दीवारों में कहीं अटकी होगी। समय ने लोगों की आवाजें छीन लीं, मगर पत्थर बड़ी अजीब चीज है वह सुनता सब है और बोलता कुछ नहीं।
मैंने बच्चों को जन्म लेते देखा और उन्हीं बच्चों को अपनी आंखों के सामने बूढ़ा होते देखा। किसी के घर शिशु का जन्म हुआ तो उसके पहले स्नान के लिए मेरा जल लिया गया। महिलाएं मंगलगीत गाती हुई मेरी दहलीज तक आईं। किसी घर में बेटा हुआ, किसी घर में बेटी मेरे लिए दोनों की किलकारी एक समान थी। वे बच्चे धीरे-धीरे बड़े हुए। स्कूल जाने से पहले रस्सी और बाल्टी लेकर मेरे पास आते। कोई पानी भरता, कोई मेरी जगत पर बैठकर खेलता, कोई भीतर झांककर अपनी परछाईं देखकर मुस्कराता। मेरे शीतल जल ने कितने बच्चों का बचपन अपने भीतर समेटा, उसका लेखा शायद मेरे जल की एक-एक बूंद में लिखा हुआ है।
फिर वही बच्चे जवान हुए। उनके चेहरे पर बचपन की गोलाई की जगह जिम्मेदारियों की रेखाएं आईं। उनकी शादियां हुईं। किसी घर में बारात आई तो मेरी दहलीज भी उसकी अगवानी में शामिल हुई। घोड़ी की टाप, शहनाई की धुन, ढोल की थाप और औरतों के मंगलगीत इन सबकी आवाजें मैंने अपने भीतर उतारी हैं। जब कोई नई दुल्हन पहली बार मेरे मोहल्ले में आई तो मेरी पूजा के बाद ही मानो उसे इस मिट्टी ने अपना माना। उसके झुके हुए मस्तक ने मेरी जगत को छुआ और मैंने उस पल में एक घर की बहू को पूरे गांव की बेटी बनते देखा। विवाह से पहले भी मेरा पूजन होता था। मैं उस गांव के लिए केवल पानी नहीं था; मैं उसके संस्कारों का मौन प्रहरी था।
लेकिन जहां विवाह की शहनाई होती है, वहां विदाई का रुदन भी होता है। कितनी बेटियां मेरी दहलीज के पास से विदा हुई हैं। मां ने बेटी को गले लगाया, बेटी ने मां की छाती से मुंह छिपाया और दोनों के आंसू बहते रहे। उस समय मेरे भीतर का जल भी जैसे स्थिर हो जाता था। कोई लहर नहीं उठती थी। जैसे मैं भी उस विदाई के दुख में सिर झुकाकर खड़ा हो जाता था। मां की वह आवाज—“बिटिया, अपना ख्याल रखना आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजती है। मनुष्य भूल जाता है, समय ढक देता है, मगर स्मृति की मिट्टी बड़ी जिद्दी होती है; वह दबती जरूर है, मिटती नहीं।
जेठ की दोपहरी में मेरी उपयोगिता जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी जैसी हो जाती थी। सूरज आग बरसाता, धरती तपकर तवे जैसी हो जाती और खेतों से लौटते किसान की चाल में थकान उतर आती। दूर से बैलों के गले की घंटियां सुनाई देतीं—टुन… टुन… टुन…। वे थके-मांदे मेरी जगत पर आकर रुकते। उनके शरीर से पसीना टपकता, नथुने तेजी से फूलते-सिकुड़ते और आंखों में ऐसी थकान होती, जैसे दिन भर उन्होंने मनुष्य का ही नहीं, धरती का बोझ भी अपने कंधों पर उठाया हो। मैं अपना ठंडा जल उन्हें देता और कुछ ही क्षणों में उनकी सांसें सामान्य होने लगतीं। किसान भी मेरी जगत पर बैठता, हथेली में पानी भरकर चेहरा धोता, फिर एक लंबा घूंट भरता और जैसे उसकी आत्मा तक ठंडक पहुंच जाती।
राहगीरों के लिए भी मैं उस तपती धरती पर एकमात्र आसरा था। कोई दूर से आता, मेरी जगत की छाया में बैठ जाता और पानी पीकर कुछ देर आंखें बंद कर लेता। उसके चेहरे की थकान धीरे-धीरे उतरती। वह उठता, मेरी ओर कृतज्ञता से देखता और अपने रास्ते चला जाता। मैंने कभी किसी से उसका परिचय नहीं पूछा। प्यासे की जात एक थी, थकान का रंग एक था और मेरी दहलीज पर सबके लिए पानी समान था।
मेरे भीतर केवल पानी नहीं था, आस्था भी थी। आसपास के लोगों के लिए मेरा मान कुछ और था। वरुण देवता से जुड़े नियम-कायदे और धार्मिक परंपराओं का पालन मेरी दहलीज पर किया जाता था। लोग मेरे पास माथा टेकते। कार्तिक मास में तो मेरी भोर ही किसी तीर्थ जैसी हो जाती। ब्रह्ममुहूर्त में युवतियां उपवास रखकर अपने मनोरथों की सिद्धि के लिए आतीं। चारों ओर अंधकार होता, हवा में ठंडक होती और मेरी जगत पर पूजा की तैयारी। स्नान के बाद उनकी आवाजें उठतीं “जागिए ब्रजराज, सवेरा हुआ…”। उस समय लगता जैसे रात अपनी चादर समेट रही है और मेरे आंगन में नया दिन जन्म ले रहा है। कितनी प्रार्थनाएं मेरी दहलीज पर रखी गईं, कितनी मनोकामनाएं मेरे जल को साक्षी बनाकर मांगी गईं—उनका कोई हिसाब नहीं।
मेरे आंगन में केवल धार्मिक रस्में नहीं हुईं; गांव का पूरा जीवन मेरे इर्द-गिर्द सांस लेता रहा। खेत से लौटे किसान से लेकर राहगीर तक, मेहमान से लेकर घर की बहू तक, बच्चे से लेकर बूढ़े तक—हर किसी के लिए मेरे पास कुछ न कुछ था। शायद इसीलिए मेरा संबंध किसी एक परिवार से नहीं, पूरे गांव से था।
फिर समय ने करवट ली। वह करवट जो धीरे-धीरे आती है और जब तक मनुष्य समझता है, बहुत कुछ बदल चुकी होती है। हैंडपंप आया। पानी अब रस्सी और बाल्टी से नहीं, लोहे के एक-दो धक्कों से मिलने लगा। सुविधा बढ़ी तो मेरे पास आने की जरूरत घट गई। पहले पनिहारिनें रोज आती थीं, फिर कभी-कभी आने लगीं, फिर उनके कदम पूरी तरह रुक गए। मेरी जगत, जो कभी सुबह चार बजे से चहल-पहल से भर जाती थी, अब धूप में अकेली पड़ी रहती। घड़ों की खनक चली गई, चूड़ियों की छनक चली गई, बच्चों की किलकारियां चली गईं और मेरी दहलीज पर एक ऐसा सन्नाटा उतर आया, जिसे मैं आज तक नहीं हटा पाया।
मैं प्रतीक्षा करता रहा। हर आहट पर लगता कोई अपना लौट आया। हवा चलती तो लगता किसी की पायल बज रही है। दूर बैल की घंटी सुनाई देती तो लगता कोई पुराना किसान लौट रहा है। किसी बच्चे की आवाज सुनाई पड़ती तो मैं अपनी बूढ़ी ईंटों के भीतर जैसे चौंक उठता। मगर कोई मेरे पास नहीं आता था।
फिर वे लोग भी जाने लगे, जिनके लिए मैं कभी जीवन का हिस्सा था। एक-एक करके वे चेहरे मिटते गए जिन्हें मैंने जन्म से बुढ़ापे तक देखा था। जिन्होंने मेरे निर्माण के लिए पसीना बहाया था, जिन्होंने मेरे लिए पापड़ बेले थे, जिन्होंने मेरी ईंटों को हाथ लगाया था, जिन्होंने मेरे जल को सम्मान दिया था—वे आज इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी हथेलियों की गर्मी चली गई, उनकी आवाजें चली गईं, उनकी छायाएं चली गईं। कभी-कभी सोचता हूं, यदि वे आज लौट आते और देखते कि उनकी आंखों के सामने बना यह कुआं अब ध्वस्त किया जा रहा है, तो क्या वे मुझे पहचान पाते? क्या वे मेरी टूटी हुई जगत को हाथ से छूकर कह पाते यही है वह कुआं? या उनकी आंखें इतना कहने से पहले ही भर आतीं?
शायद वे रोते नहीं।
गांव का बूढ़ा आदमी अक्सर रोता नहीं है।
वह बस चुप हो जाता है।
और उसकी चुप्पी में जितना दुख होता है, उतना शब्दों के पूरे भंडार में भी नहीं होता।
आज मेरी भी वही घड़ी है।
मुझे ध्वस्त किया जा रहा है। मेरी ईंटें गिराईं जा रहीं हैं। मेरी जगत का सिंहासन धूल धूसरित कर दिया गया है। टूटेगी। जिस जगह कभी सुबह चार बजे पानी हिलोरें मारता था, वहां अब मलबा बिखरा पड़ा है, जहां पनिहारिनों की हंसी गूंजती थी, वहां सन्नाटा है।, जहां नववधुएं माथा टेकती थीं, वहां शायद आने वाली पीढ़ी को यह भी मालूम न होगा कि यहां कभी किसी दुल्हन की पहली पूजा हुई थी। जहां किसी बच्चे के जन्म पर मंगलगीत गाए गए थे, वहां शायद कोई यह नहीं जान पाएगा कि इसी मिट्टी ने कभी उन गीतों को सुना था।
मगर मेरे टूटने का सबसे बड़ा दुख मेरी ईंटों को नहीं है।
मुझे दुख इस बात का है कि मेरे साथ वह समय भी टूट रहा है, जिसमें लोग एक-दूसरे के पास बैठते थे।
वह समय, जिसमें पानी भरने आई पनिहारिन केवल पानी लेकर नहीं लौटती थी, किसी पड़ोसन का दुख भी साथ ले जाती थी।
वह समय, जिसमें राहगीर पानी पीकर आगे बढ़ता था तो उसे लगता था कि इस अनजान गांव में भी किसी ने उसकी प्यास को अपना समझा।
वह समय, जिसमें किसी दुल्हन की पूजा में पूरा गांव शामिल होता था।
वह समय, जिसमें बच्चे मिट्टी में खेलकर बड़े होते थे और उनकी यादों में कुएं, खेत, बैल, पगडंडी और घर एक ही संसार के हिस्से होते थे।
आज मुझे तोड़ा जा सकता है, मगर उस समय को कौन तोड़ेगा?
मेरी ईंटें उठाकर फेंकी जा सकती हैं, मगर उन हाथों की छाप कौन मिटाएगा जिन्होंने मुझे बनाया था?
मेरी जगत मिट्टी में मिलाई जा सकती है, मगर उस पर बैठी पनिहारिनों की हंसी किस मिट्टी में दबाओगे?
मेरे भीतर का पानी खत्म किया जा सकता है, मगर उस पानी से जुड़े बचपन को किस कुएं में डालोगे?
मैं अब शायद इतिहास का एक छोटा-सा पन्ना बनकर रह जाऊंगा। मगर मेरे लिए इतिहास पत्थर पर खुदा हुआ कोई नाम नहीं है। मेरा इतिहास उन चेहरों की कतार है, जिनमें से अधिकांश अब इस दुनिया में नहीं हैं। मेरा इतिहास वह मां है जिसने बेटी की विदाई पर मेरे पास आकर आंसू बहाए। मेरा इतिहास वह किसान है जिसने जेठ की दुपहरी में मेरे जल से अपनी थकान धोई। मेरा इतिहास वह बच्चा है जिसने स्कूल जाने से पहले रस्सी मेरे भीतर डाली। मेरा इतिहास वह दुल्हन है जिसने मेरे सामने सिर झुकाया। मेरा इतिहास वह पनिहारिन है जिसकी चूड़ियों की आवाज से मेरी सुबह हुआ करती थी। मेरा इतिहास वह बूढ़ा है, जिसने अपनी अंतिम सांसों तक मुझे अपने गांव की निशानी समझा।
और आज जब मैं टूट रहा हूं, तो लगता है जैसे किसी बूढ़े आदमी का घर नहीं, उसकी पूरी जिंदगी ढह रही हो।
यदि कभी मेरी जगह से गुजरना, तो जल्दी में मत निकल जाना। एक पल ठहर जाना। मिट्टी को हाथ से छूना। आंखें बंद करना। शायद तुम्हें रस्सी की चरमराहट सुनाई दे। शायद घड़े की खनक कानों तक पहुंचे। शायद बैलों की घंटियां सुनाई दें। शायद किसी बच्ची की किलकारी हवा में तैरती मिले। शायद किसी मां की सिसकी सुनाई दे। शायद कार्तिक की उस भोर से कोई धीमी आवाज लौट आए—“जागिए ब्रजराज, सवेरा हुआ…”
और यदि उस क्षण तुम्हारी आंखों से आंसू निकल आएं, तो उन्हें पोंछना मत।
उन्हें बहने देना।
क्योंकि वे आंसू मेरे लिए नहीं होंगे।
वे उन लोगों के लिए होंगे जो अब लौटकर नहीं आएंगे।
उन हाथों के लिए होंगे जिन्होंने मुझे बनाया और मिट्टी में मिल गए।
उन पैरों के लिए होंगे जो कभी मेरी जगत तक आए और अब हमेशा के लिए थम चुके हैं।
उन बच्चों के लिए होंगे जिनका बचपन मेरे पानी में खेला और जिनकी जवानी ने मुझे पीछे छोड़ दिया।
उन बेटियों के लिए होंगे जिनकी विदाई मैंने देखी।
उन दुल्हनों के लिए होंगे जिन्होंने मेरी पूजा के बाद इस गांव में पहला कदम रखा।
उन किसानों के लिए होंगे जिनकी थकान मैंने अपनी ठंडक से चुराई।
और उस समय के लिए होंगे, जो एक बार बीत जाए तो फिर लाख पुकारने पर भी लौटकर नहीं आता।
मैं कुआं हूं।
कल शायद मैं यहां न रहूं।
मेरी जगत न होगी।
मेरी ईंटें न होंगी।
मेरे भीतर पानी न होगा।
लेकिन अगर किसी बूढ़ी आंख में मेरी छवि बची रह गई, अगर किसी पोते को उसका दादा कभी यह बता गया कि “यहीं वह कुआं था, जहां तुम्हारे पिता बचपन में नहाया करते थे”, अगर किसी मां ने अपनी बेटी को कभी मेरी दहलीज की कथा सुनाई, तो समझ लेना—मैं अभी मरा नहीं हूं।
मैं मिट्टी से उठकर स्मृति में चला गया हूं।
और स्मृति की भी अपनी एक उम्र होती है—वह तब तक जीवित रहती है, जब तक कोई उसे याद करने वाला जीवित रहता है।
इसलिए मेरी आखिरी इच्छा बस इतनी है कि मुझे टूटे हुए पत्थरों का ढेर मत समझना।
मैं पत्थर नहीं हूं।
मैं उन लोगों की सांसों का अवशेष हूं जो चले गए।
मैं उन आवाजों की प्रतिध्वनि हूं जो अब सुनाई नहीं देतीं।
मैं उन आंसुओं की नमी हूं जिनका कोई हिसाब नहीं रखा गया।
मैं उस गांव का वह बूढ़ा साक्षी हूं, जिसने सबको आते देखा, सबको जीते देखा और फिर एक-एक करके सबको जाते देखा।
और अब जब मेरी अपनी बारी आई है, तो मैं किसी से शिकायत नहीं करता।
बस अपनी बूढ़ी आंखों से आखिरी बार गांव को देखता हूं और मन ही मन कहता हूं—
“मैंने तुम्हारी प्यास बुझाई थी, तुमने मुझे अपनी स्मृतियां दी थीं। आज तुम मुझे तोड़ रहे हो, कोई बात नहीं। मेरी ईंटें चली जाएंगी, मेरा पानी चला जाएगा, मगर तुम्हारा बचपन मेरे भीतर हमेशा रहेगा।”
मैं कुआं हूं।
मेरी दहलीज पर कभी एक पूरा गांव जीता था।
आज उसी गांव की यादें मेरी टूटी हुई ईंटों के नीचे दफ्न होने जा रही हैं।
और शायद सबसे बड़ा दुख यही है कुआं तो टूट जाएगा, मगर उसे देखकर रोने वाले भी एक दिन नहीं रहेंगे।
उस दिन मेरी कहानी सचमुच खत्म हो जाएगी।

